पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘अमृत काल’ के बड़े-बड़े दावे अब धरातल पर फेल साबित हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि विदेशी निवेशकों के भरोसे को लेकर जारी ग्लोबल एफडीआई कॉन्फिडेंस इंडेक्स में भारत का दुनिया की टॉप-15 निवेश अर्थव्यवस्थाओं की सूची से बाहर होना गंभीर चिंता का विषय है।
हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि वर्ष 2016 में भारत विदेशी निवेश के लिहाज से दुनिया के टॉप-10 देशों में शामिल था, लेकिन अब 2026 में भारत टॉप-15 सूची से भी बाहर हो गया है। उन्होंने इसे केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता बताया।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट साझा करते हुए चीमा ने लिखा कि भाजपा सरकार ने वास्तविक आर्थिक सुधारों के बजाय केवल प्रचार और इमेज बिल्डिंग पर ध्यान दिया है। उन्होंने कहा कि निवेशकों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है और कई बड़े निवेश समझौते केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं।
“नीति अस्थिरता से विदेशी निवेशक दूर हो रहे”
वित्त मंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की बढ़ती नीति अनिश्चितता के कारण विदेशी निवेशक अब भारत के बजाय अन्य देशों का रुख कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत का निवेश माहौल कमजोर हुआ है और व्यापारिक समझौते भी मजबूती के बजाय समझौते की स्थिति में किए जा रहे हैं।
चीमा ने कहा कि “अमृत काल” के दावों के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि विदेशी निवेशक भारत में निवेश को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हो गए हैं। उन्होंने दावा किया कि भाजपा सरकार केवल हेडलाइन मैनेजमेंट में लगी हुई है, जबकि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए जरूरी सुधारों की अनदेखी की जा रही है।
ग्लोबल एफडीआई रैंकिंग से बाहर होना क्यों अहम?
एफडीआई कॉन्फिडेंस इंडेक्स किसी देश की आर्थिक स्थिरता, नीति निरंतरता और विकास संभावनाओं को लेकर वैश्विक निवेशकों के भरोसे को दर्शाता है। 2016 में भारत का टॉप-10 निवेश गंतव्यों में शामिल होना मजबूत वैश्विक विश्वास का संकेत माना गया था।
हालांकि, 2026 में भारत का टॉप-15 सूची से बाहर होना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अब भारत में निवेश को लेकर ज्यादा सतर्क हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यूएई, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया जैसे देश तेजी से ग्लोबल निवेश आकर्षित कर रहे हैं, जबकि भारत में नीति अस्थिरता, औद्योगिक सुस्ती और निवेश घोषणाओं के क्रियान्वयन में कमी जैसी चुनौतियां सामने आ रही हैं।








