पंजाब में आर्मी पब्लिक स्कूलों में संस्कृत को अनिवार्य और पंजाबी को वैकल्पिक विषय बनाए जाने के फैसले के खिलाफ विरोध तेज हो गया है। फगवाड़ा की साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं ने इस फैसले को पंजाबी भाषा के साथ भेदभाव बताते हुए पंजाब सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है।
मुख्यमंत्री के नाम सौंपा गया मांग पत्र
फगवाड़ा में पंजाबी कला एवं साहित्य केंद्र, स्केप साहित्यक संस्था और पंजाबी विरसा ट्रस्ट समेत कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने एसडीएम फगवाड़ा के माध्यम से मुख्यमंत्री पंजाब को मांग पत्र भेजा। इसमें आर्मी पब्लिक स्कूल समिति (APS) द्वारा अकादमिक सत्र 2026-27 से संस्कृत को अनिवार्य और पंजाबी को केवल अतिरिक्त वैकल्पिक विषय बनाने के आदेश को वापस लेने की मांग की गई।
“पंजाब में पंजाबी के साथ सौतेला व्यवहार बर्दाश्त नहीं”
इस मौके पर साहित्यकार तਰਨजीत सिंह किन्नड़ा और गुरमीत सिंह पलाही ने कहा कि पंजाब में पंजाबी भाषा के साथ सौतेला व्यवहार किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह फैसला पंजाब भाषा कानून-2008 का सीधा उल्लंघन है।
प्रतिनिधियों ने बताया कि पंजाब भाषा कानून के अनुसार राज्य के सभी सरकारी, निजी और केंद्रीय स्कूलों में दसवीं कक्षा तक पंजाबी पढ़ाना अनिवार्य है और आर्मी पब्लिक स्कूल भी इसी दायरे में आते हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति का हवाला
विरोध कर रहे संगठनों ने कहा कि बच्चों पर जबरन संस्कृत थोपना राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के खिलाफ है। नीति में मातृभाषा में शिक्षा और भाषाई स्वतंत्रता को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
मांग पत्र में सरकार से अपील की गई कि आर्मी पब्लिक स्कूलों में दसवीं तक पंजाबी को अनिवार्य विषय बनाए रखा जाए और पंजाबी भाषा, संस्कृति एवं विरासत को कमजोर करने वाली नीतियों पर रोक लगाई जाए।
कई सामाजिक और साहित्यिक हस्तियां रहीं मौजूद
इस दौरान कई साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता, किसान नेता और व्यापारी संगठनों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। कार्यक्रम में प्रेस क्लब, किसान संगठनों और विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के सदस्यों ने भी समर्थन जताया।
इसके अलावा उपस्थित बुद्धिजीवियों ने चंडीगढ़ में पंजाबी भाषा को उचित स्थान देने की मांग को लेकर केंद्रीय पंजाबी लेखक सभा द्वारा निकाले जा रहे रोष मार्च का भी समर्थन किया।








