आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक Arvind Kejriwal ने एक अहम और विवादित निर्णय लेते हुए ऐलान किया है कि वह अपने चल रहे केस में जस्टिस Swarnkanta Sharma की अदालत में न तो खुद पेश होंगे और न ही अपनी ओर से कोई कानूनी दलील रखेंगे। उन्होंने कहा कि उन्हें इस अदालत से निष्पक्ष न्याय मिलने की उम्मीद अब नहीं रही, इसलिए उन्होंने यह कदम अपनी “अंतरात्मा की आवाज” और महात्मा गांधी के सिद्धांतों के तहत उठाया है।
केजरीवाल ने बताया कि उन्होंने इस फैसले की जानकारी जस्टिस शर्मा को एक औपचारिक पत्र लिखकर दे दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम किसी व्यक्तिगत विरोध या न्यायपालिका के अपमान के लिए नहीं है, बल्कि न्याय व्यवस्था की पारदर्शिता और लोगों के विश्वास को बनाए रखने के उद्देश्य से उठाया गया है।
“हितों के टकराव” बना मुख्य मुद्दा
केजरीवाल ने अपने बयान में कहा कि उन्होंने पहले ही जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से अनुरोध किया था कि वे इस मामले से खुद को अलग कर लें, क्योंकि इसमें संभावित “हितों का टकराव” (Conflict of Interest) है। उनका आरोप है कि इस केस में केंद्र सरकार की एजेंसी सीबीआई उनके खिलाफ है, जबकि जज के परिवार के सदस्य केंद्र सरकार के कानूनी पैनल से जुड़े हुए हैं।
उन्होंने दावा किया कि अदालत में उनके खिलाफ पैरवी कर रहे सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ही उन वकीलों को केस आवंटित करते हैं, जिनमें जज के परिवार के सदस्य भी शामिल हैं। ऐसे में, केजरीवाल के मुताबिक, निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
आरएसएस से जुड़ाव पर भी उठाए सवाल
केजरीवाल ने एक और संवेदनशील मुद्दा उठाते हुए कहा कि जस्टिस शर्मा का जुड़ाव Rashtriya Swayamsevak Sangh से संबंधित मंचों से रहा है। उन्होंने कहा कि वह और उनकी पार्टी उस विचारधारा के विरोधी हैं, इसलिए उन्हें आशंका है कि क्या उन्हें निष्पक्ष न्याय मिल पाएगा।
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका जज या उनके परिवार से कोई व्यक्तिगत विवाद नहीं है और वे उनका सम्मान करते हैं।
“न्याय सिर्फ होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए”
अपने बयान में केजरीवाल ने न्याय के मूल सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि “न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।” उन्होंने कहा कि जब इस सिद्धांत पर सवाल खड़े होते हैं, तो किसी भी पक्ष के लिए अदालत की निष्पक्षता पर भरोसा करना कठिन हो जाता है।
उन्होंने कहा कि उन्होंने पूरी विनम्रता के साथ जज से केस से अलग होने का अनुरोध किया, लेकिन जब उनकी यह मांग अस्वीकार कर दी गई, तो उन्होंने सत्याग्रह का रास्ता अपनाने का निर्णय लिया।
गांधीवादी रास्ते पर “सत्याग्रह”
केजरीवाल ने अपने फैसले को Mahatma Gandhi के सिद्धांतों से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि जब सभी संवाद और प्रयास विफल हो जाते हैं, तब व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हुए शांतिपूर्ण विरोध यानी सत्याग्रह करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह विरोध किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक सिद्धांत के पक्ष में है। वह अदालत के फैसले को चुनौती देने के लिए अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग भविष्य में कर सकते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट जाना भी शामिल है।
न्यायपालिका पर भरोसा बरकरार
हालांकि केजरीवाल ने अदालत की निष्पक्षता पर सवाल उठाए, लेकिन उन्होंने यह भी दोहराया कि उन्हें भारतीय न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि पहले भी जब उनके खिलाफ साजिशें हुईं, तब न्यायपालिका ने ही उन्हें राहत दी और निर्दोष घोषित किया।
उन्होंने कहा, “मैं आज आजाद हूं तो यह न्यायपालिका की वजह से ही संभव हुआ है। मेरा उद्देश्य न्याय व्यवस्था को कमजोर करना नहीं, बल्कि उसमें लोगों का भरोसा और मजबूत करना है।”
राजनीतिक और कानूनी हलकों में हलचल
केजरीवाल के इस फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। एक तरफ इसे न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाला कदम माना जा रहा है, तो दूसरी तरफ उनके समर्थक इसे सिद्धांतों की लड़ाई बता रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला आने वाले समय में न्यायिक नैतिकता (Judicial Ethics) और हितों के टकराव जैसे मुद्दों पर व्यापक बहस को जन्म दे सकता है।
आगे क्या?
अब यह देखना अहम होगा कि अदालत इस स्थिति में क्या रुख अपनाती है और बिना बचाव पक्ष की दलीलों के मामले की सुनवाई कैसे आगे बढ़ती है। साथ ही, यदि केजरीवाल सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हैं, तो यह मामला और भी बड़ा संवैधानिक मुद्दा बन सकता है।








