आम आदमी पार्टी (AAP) और राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा के बीच विवाद अब खुलकर सामने आ गया है। पार्टी ने उन्हें राज्यसभा में उपनेता पद से हटाने को “सामान्य प्रक्रिया” बताते हुए उनके हालिया रुख पर गंभीर सवाल उठाए हैं। AAP नेताओं का आरोप है कि राघव चड्ढा लंबे समय से पार्टी लाइन से हटकर काम कर रहे थे और जनहित से जुड़े मुद्दों पर भाजपा तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ बोलने से बचते रहे हैं।
पार्टी का कहना है कि चड्ढा ने कई अहम मौकों पर व्हिप का उल्लंघन किया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर न करना और एलपीजी संकट जैसे मुद्दों पर संसद में चुप रहना शामिल है। AAP के अनुसार, यह रुख पार्टी की विचारधारा के विपरीत है, जहां नेतृत्व ने हमेशा निडर होकर सत्ता से सवाल पूछने पर जोर दिया है।
भगवंत मान का बयान: पार्टी निर्णय सामान्य प्रक्रिया
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने इस पूरे मामले को पार्टी का आंतरिक निर्णय बताते हुए कहा कि संसद में नेता और उपनेता बदलना कोई असामान्य बात नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर राजनीतिक दल में अनुशासन सर्वोपरि होता है और यदि कोई सदस्य पार्टी व्हिप के खिलाफ जाता है, तो कार्रवाई स्वाभाविक है।
मान ने कहा कि संसद में कई बार विपक्षी दलों को सामूहिक रूप से निर्णय लेने होते हैं—जैसे वॉकआउट या विरोध प्रदर्शन—और ऐसे समय में असहमति पार्टी अनुशासन के खिलाफ मानी जाती है।
संजय सिंह का हमला: ‘जनहित के मुद्दों पर चुप क्यों?’
AAP सांसद संजय सिंह ने राघव चड्ढा पर सीधे सवाल दागते हुए कहा कि पार्टी ने अरविंद केजरीवाल से निडरता और संघर्ष की राजनीति सीखी है, लेकिन चड्ढा ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी साध रखी है।
उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग से जुड़े विवाद, पंजाब के अधिकार, गुजरात में पार्टी कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई जैसे मुद्दों पर चड्ढा ने संसद में कोई आवाज नहीं उठाई। संजय सिंह के अनुसार, जनता जानना चाहती है कि आखिर वह किस वजह से इन सवालों से बच रहे हैं।
सौरभ भारद्वाज: ‘डर की राजनीति नहीं चलेगी’
दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम होती है और उसे सरकार से कठोर सवाल पूछने चाहिए। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि संसद में सीमित समय का उपयोग “सॉफ्ट मुद्दों” के बजाय बड़े जनहित के मुद्दों के लिए होना चाहिए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चड्ढा ने लंबे समय से ऐसा कोई मुद्दा नहीं उठाया, जिसमें उन्होंने केंद्र सरकार को सीधे चुनौती दी हो। भारद्वाज ने कहा कि “जो डर गया, समझो मर गया” की भावना के साथ ही राजनीति करनी होगी।
आतिशी का सवाल: ‘क्या भाजपा से डरते हैं?’
दिल्ली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष आतिशी ने भी राघव चड्ढा के रुख पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश इस समय लोकतंत्र और संविधान से जुड़े गंभीर संकटों से गुजर रहा है, लेकिन चड्ढा इन मुद्दों पर मुखर नहीं दिखते।
उन्होंने एलपीजी गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों, चुनावी गड़बड़ियों और विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई जैसे मुद्दों का हवाला देते हुए पूछा कि क्या वह भाजपा या प्रधानमंत्री से सवाल पूछने से डरते हैं।
आतिशी ने यह भी कहा कि जब अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के दौरान पार्टी कार्यकर्ता सड़कों पर संघर्ष कर रहे थे, उस समय भी चड्ढा की भूमिका सवालों के घेरे में रही।
अनुराग ढांडा का बयान: ‘निडरता ही पहचान’
AAP के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अनुराग ढांडा ने कहा कि पार्टी की पहचान निडर राजनीति है। उन्होंने आरोप लगाया कि संसद में सीमित समय का उपयोग देश के बड़े मुद्दों के लिए होना चाहिए, लेकिन चड्ढा ने कई मौकों पर ऐसा नहीं किया।
ढांडा ने कहा कि यदि कोई नेता सरकार के खिलाफ बोलने से कतराता है, तो वह देश के लिए संघर्ष कैसे करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में चड्ढा के रुख में बदलाव देखने को मिला है।
राजनीतिक संकेत और आगे की राह
इस पूरे विवाद ने AAP के भीतर मतभेदों को सार्वजनिक कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक पद परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के अंदर अनुशासन, नेतृत्व शैली और राजनीतिक रणनीति से जुड़े बड़े सवाल भी खड़े करता है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राघव चड्ढा इन आरोपों पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या यह विवाद पार्टी के भीतर और गहराता है या फिर सुलझ जाता है।










